श्रीमद्भगवद्गीतोक्त आहार विमर्श

Authors

  • Dr. Surendra Mahto SLBSNSU New Delhi-16

Abstract

 युक्ताहारविहारस्य ............।।यहाँ दुःख निवृत्तिके उपाय के रूप में समुचित दिनचर्या के महत्त्व पर बल दिया गया है। जिसके अन्तर्गत आहार, विहारादि दैनिक क्रिया को उजागर किया है। ये क्रियाएँ सामान्य रूप से प्राणीमात्र में देखी जाती हैं। कहा भी गया है-"आहार निद्राभय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।" इस तरह आहार-निद्रादि सभी नितान्त जैविक आवश्यकताएँ (extreme biological needs) हैं। जिसके बिना जीवन असम्भव सा है। इन सभी में आहार का स्थान सर्वप्रमुख है। 'आह्रियते इति आहारः' अर्थात् जिसे ग्रहण (भोजन) किया जाए, अथवा खाने योग्य होने से आहार के रूप में प्रसिद्ध है। जिसका वर्णन सभी प्रकार के भारतीय वाङ्‌मय में विस्तार से किया गया है। विशेषकर संस्कृत ग्रन्थों वेद-उपनिषद आयुर्वेदादि प्रमुख हैं। इसी तरह श्रीमद्‌भगवद्‌गीता जो भारतीय वाङ्‌मय में विशिष्ट स्थान रखता है। इन में भी आहार की आवश्यकता, प्रकार एवं मात्रा के विषय में वर्णन किया गया है। जिसके अन्तर्गत त्रिगुण सम्बद्ध आहार के प्रकार -सात्विक, राजस एवं तामस प्रधानगुण युक्त भोज्य के परिणामों का उदाहरण सहित व्याख्या की गयी है। जिसे अपनाकर व्यक्ति (साधक) अपने भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त कर सकता है। गीतोक्त आहार पद्ध‌ति के द्वारा व्यक्ति आत्म कल्याण एवं विश्व कल्याणपरक चिन्तन को विकसित कर सकता है।इस आलेख में गीता के तथ्यों को अन्य शास्त्रीय सन्दर्भों द्वारा परिपुष्ट करने का यथा सम्भव प्रयत्न किया गया है।

Published

2026-04-02

How to Cite

Mahto, D. S. (2026). श्रीमद्भगवद्गीतोक्त आहार विमर्श. जम्बूद्वीप - the E-Journal of Indic Studies (ISSN: 2583-6331), 5(1). Retrieved from http://journal.ignouonline.ac.in/index.php/jjis/article/view/2293