श्वेतकेतु के प्रसंग मे परिलक्षित मनोरूग्णता प्रतिरोधन के लिए परामर्श-आधारित उपचारपद्धति का औपनिषदिक प्रारूप
Abstract
स्वास्थ्य सदैव से मानवता के लिए एक मूलभूत चिन्ता का विषय रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी सदैव विमर्श का केन्द्रीय आयाम रहा है। हाल के दशकों में मानसिक स्वास्थ्य-संबंधी असंतुलनों में तेजी से हुई अप्रत्याशित वृद्धि यह आवश्यकता इंगित करती है कि इन समस्याओं के निवारण हेतु समग्र, एकीकृत एवं समुदाय-आधारित उपचारपद्धति अनिवार्य है। आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) एवं सचेतनता (Mindfulness) पर केन्द्रित परामर्श-आधारित उपचारपद्धति (counseling-based intervention) एक संभावनापूर्ण वैकल्पिक माध्यम के रूप में उभर रही है, जिसके अनुकूल परिणाम प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार की पद्धति के लिए अपेक्षित विधियों का भण्डार वैदिक साहित्य में विद्यमान है। मन के नियमन एवं संयमन की धारणा वैदिक वाङ्मय में निरन्तर प्रतिपादित हुई है, जिसका उदाहरण शिवसंकल्प सूक्त एवं उत्तरवर्ती उपनिषदिक ग्रन्थों में स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित श्वेतकेतु का प्रसंग मनोचिकित्सात्मक दृष्टि से विश्लेषित किया जा सकता है, जिसमें श्वेतकेतु को मानसिक रूप से विचलित व्यक्ति एवं उद्दालक को उसके परामर्शदाता (counselor) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। श्वेतकेतु निराशा के साथ-साथ अभिमान से भी ग्रसित है। इन दोनों अवस्थाओं में उद्दालक उसे प्रेरक संवाद की प्रक्रिया से उबारते हैं एवं उसे अद्वैत वेदान्त का एक महावाक्य “तत् त्वम् असि” प्रदान करते हैं। यह प्रसंग वह कार्यपद्धति प्रस्तुत करता है जिसके माध्यम से व्यक्ति मानसिक विघटन एवं अस्थिरता की परिस्थिति से मार्ग निकाल सकता है। यही पद्धति भारतीय परम्परा के अन्य प्रधान ग्रन्थों, जैसे रामायण एवं महाभारत में भी परिष्कृत रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह शोध-पत्र मुख्य रूप से श्वेतकेतु के प्रसंग के आलोक में आत्म-साक्षात्काराधारित परामर्श-पद्धति का मनोवेदना (mental suffering) के प्रभावी निवारण के रूप में अध्ययन करेगा जिससे इसकी स्थायी उपयोगिता एवं सांस्कृतिक प्रासंगिकता की पुष्टि की जा सके।
कुंजी शब्द
मनोरूग्णता, परामर्श, उपदेश, स्वास्थ्य, उपचारपद्धति