धर्मशास्त्रीय राजधर्म की वैश्विक उपादेयता

Authors

  • amita singh mgkvp varanasi

Keywords:

बीज शब्द- धर्मशास्त्र, राजधर्म, अष्टलोकपाल, मण्डल-सिद्धान्त, षाड्गुण्य नीति, उपाय चतुष्टय, न्याय-विधान, दण्ड-विधान।

Abstract

सारांश- धर्मशास्त्रीय राजधर्म प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णित शासन-व्यवस्था का मूलभूत सिद्धान्त है, जो राजा या शासक के कर्तव्यों को धर्म, नैतिकता और सामाजिक न्याय के आधार पर परिभाषित करता है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, कौटिलीय अर्थशास्त्र, कामन्दकीय नीतिसार और महाभारत जैसे ग्रन्थों में राजशास्त्र को ‘धर्मराज्य‘ की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ शासक को प्रजा की रक्षा, न्याय की स्थापना और लोक-कल्याण का दायित्व प्रदान किया जाता है। राजधर्म के मूल सिद्धान्तों में धर्म (नैतिकता), अर्थ (आर्थिक समृद्धि), काम (इच्छा सन्तुष्टि) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) का सन्तुलन सम्मिलित है। यद्यपि राजधर्म की वैश्विक उपादेयता में चुनौतियाँ भी हैं। प्राचीन शास्त्रों में वर्ण-व्यवस्था और राजा की निरंकुशता के तत्त्व आधुनिक समानता और लोकतन्त्र से टकराते हैं। तथापि, इसके सार्वभौमिक सिद्धान्त, जैसे- न्याय, करुणा और दायित्व को अनुकूलित कर वैश्विक शासन में लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए- अन्ताराष्ट्रिय न्यायालय में राष्ट्रों के मध्य विवाद सुलझाने की प्रक्रिया राजधर्म की ‘धर्मयुद्ध‘ अवधारणा से प्रेरित प्रतीत होती है, जहाँ युद्ध अन्तिम विकल्प होता है। स्पष्टतः राजधर्म न केवल प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन की धरोहर है, अपितु आधुनिक वैश्विक शासन के लिए भी प्रासंगिक और मार्गदर्शक नैतिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। 

Published

2026-04-02

How to Cite

singh, amita. (2026). धर्मशास्त्रीय राजधर्म की वैश्विक उपादेयता. जम्बूद्वीप - the E-Journal of Indic Studies (ISSN: 2583-6331), 5(1). Retrieved from http://journal.ignouonline.ac.in/index.php/jjis/article/view/2363